'जीवन प्रबन्धन के तत्त्व’ ग्रंथ की पृथक्-पृथक् पुस्तकें

एक झलक

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जीवन प्रबन्धन का पथ

जीवन-प्रबन्धन अर्थात् जीवन को सुव्यवस्थित करना । जीवन के सम्यक् प्रबन्धन के अभाव में एक आम आदमी बहिर्मुखी होकर कभी स्वार्थ और ममत्व के लिए, कभी कामना और वासना के लिए, तो कभी दूसरों की समीक्षा और सुधार के लिये दिन-रात प्रयासरत रहता है। वह धन-संपत्ति और सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिये सतत चिंताशील रहता है, किंतु अथक परिश्रम करने के बाद भी अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं कर पाता, परिणामतः उसका मानस तनाव एवं निराशा में डूब जाता है और इस तरह जीवन यूँ ही समाप्त हो जाता है। ऐसे निरर्थक जीवन को सार्थक बनाने के लिये आवश्यक है-जीवन को सम्यक् दिशा में नियोजित करना, इसे ही जीवन-प्रबन्धन कहते हैं।

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जैन दर्शन एवं जैन आचार शास्त्र में जीवन प्रबन्धन

जीवन का मूल उद्देश्य सुख, शांति एवं आनन्द की प्राप्ति करते हुये अन्ततः निराकुल वीतराग दशा को पाना है। इस हेतु जैनाचार्यों ने व्यापक एवं गहन दृष्टिकोण से परम तत्त्व का शोध किया, जिसे हम ‘दर्शन’ कहते हैं। दर्शन के आधार पर प्रायोगिक नीतियों का निर्माण भी किया, जिससे दर्शन का व्यावहारिक रूप प्रकट हुआ, इसे हम ’आचार’ कहते हैं । इसी प्रकार दार्शनिक सिद्धांतों को जानकर एवं प्रायोगिक-नीतियों का निर्माण कर, इनके क्रियान्वयन की प्रक्रिया का निर्धारण किया, जिसे हम ‘प्रबन्धन’ कहते हैं।

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शिक्षा प्रबन्धन

शिक्षा प्रत्येक मानव की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। यह वह प्रक्रिया है, जो जन्म से मृत्यु तक चलती रहती है। जीवन के इस महत्त्वपूर्ण पक्ष का प्रबन्धन ही शिक्षा-प्रबन्धन (Education Management) कहलाता है। शिक्षा-प्रबन्धन वस्तुतः शिक्षा का सही दिशा में नियोजन है, जिससे व्यक्ति की शिक्षा उसके व्यक्तित्व-विकास में सहायक हो सके। जैनधर्म दर्शन में भी संतुलित शिक्षा के दो पक्ष बताए गए हैं- ग्रहणात्मक-शिक्षा (सैद्धांतिक-शिक्षा) और आसेवनात्मक-शिक्षा (प्रायोगिक-शिक्षा)। शिक्षा-प्रबन्धन का विशेष वर्णन प्रस्तुत प्रकरण में किया गया है।

 

समय प्रबन्धन

किसी भी वस्तु का कोई मूल्य अवश्य होता है, लेकिन समय अनमोल है। कहावत भी है- Money Is Valuable But Time Is Invaluable। भगवान् महावीर ने समयमात्र के लिए भी प्रमाद नहीं करने का उपदेश दिया है- ‘समयं गोयम! मा पमायए’। वस्तुतः, हर व्यक्ति को नियत आयु मिलती है और इस आयु का परिमाण ही जीवन की समय-सीमा है। इसमें ही जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करना होता है, परंतु व्यक्ति अक्सर समय चूक जाता है, अतः जैनदर्शन में कहा गया है कि व्यक्ति को उचित समय पर उचित कार्य करना चाहिये- ‘काले कालं समायरे’। इस उद्देश्य की पूर्ति समय-प्रबन्धन के माध्यम से ही की जा सकती है, जिसका वर्णन प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है।

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शरीर प्रबन्धन

शरीर एक ऐसा सहयोगी है, जिसके साथ आत्मा का सम्बन्ध जन्म से मृत्यु तक बना रहता है। यह साधन के रूप में व्यक्ति के विविध पुरुषार्थों में सहयोगी होता है। भारतीय दार्शनिकों ने आध्यात्मिक पुरुषार्थ के लिये इसे साधन मानते हुये कहा भी है- ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनं’। इसका प्रयोग आवश्यक और अनावश्यक दोनों प्रवृत्तियों में हो सकता है। अतः इसका प्रबन्धन होना आवश्यक है, जिससे यह जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक नहीं, अपितु साधक सिद्ध हो सके। यह प्रबन्धन ही शरीर-प्रबन्धन कहलाता है, जिसका वर्णन प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है।

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अभिव्यक्ति प्रबन्धन

वाणी एक ऐसी योग्यता है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने भावों को प्रकट करता है। मानव में इस योग्यता का विकास सर्वाधिक है। जैनधर्मदर्शन में इस वाचिक-योग्यता का कई प्रकार से विश्लेषण किया गया है और इस शक्ति के सही एवं गलत दोनों ही प्रयोगों के परिणामों को भी दर्शाया गया है। अभिव्यक्ति-प्रबन्धन के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी वाणी का सम्यक् और संयमित प्रयोग कर सकता है। इसका वर्णन प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है।

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तनाव एवं मानसिक विकारों का प्रबन्धन

वह शक्ति, जिसके माध्यम से व्यक्ति चिन्तन, मनन, विचार आदि करता है, मन कहलाती है। वर्तमान युग में व्यक्ति के बौद्धिक और मानसिक विकास का आधार ‘मन’ है। मन का नकारात्मक प्रयोग होने पर तनाव, अवसाद आदि मानसिक रोगों की उत्पत्ति होती है, जिससे मानव-जीवन दुःखमय और भारभूत हो जाता है, अतः मन पर नियंत्रण आवश्यक है। मन का सकारात्मक प्रयोग करने पर यही मुक्ति का साधन भी बन जाता है। कहा भी गया है कि- ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’ अर्थात् मन ही मनुष्य के बन्ध और मोक्ष दोनोें का कारण है। अतः प्रत्येक मनुष्य को मन-प्रबन्धन की नितांत आवश्यकता है। मन-प्रबन्धन का आशय एक ऐसी कला से है, जिससे मानव अपने तनाव और मानसिक विकारों का सम्यक् प्रबन्धन कर सके। इसकी विस्तृत चर्चा प्रस्तुत पुस्तक में की गई है।

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पर्यावरण प्रबन्धन

व्यक्ति के चारों ओर व्याप्त परिवेश पर्यावरण कहलाता है। आज पर्यावरण सम्बन्धी समस्याएँ विश्व की ज्वलन्त समस्याएँ हैं, जिसका सम्बन्ध प्राणिमात्र से है। मानव पर्यावरणीय समस्याओें को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभा रहा है। यदि मानव अपने क्रियाकलापों पर उचित नियन्त्रण करे, तो ही विश्वव्यापी समस्या का समाधान सम्भव है। जैनधर्मदर्शन एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विचारधारा है। इसके सिद्धान्तों से न केवल आत्महित होता है, अपितु पर्यावरण सम्बन्धी चिन्ताओं का निवारण भी होता है। इन सिद्धान्तों का जीवन में प्रयोग ही पर्यावरण-प्रबन्धन कहलाता है, जिसका वर्णन प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है। यह ज्ञातव्य है कि प्रस्तुत शोध-ग्रंथ में पर्यावरण के अंतर्गत मुख्य या गैर-मानवीय परिवेश को ही शामिल किया गया है।

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समाज प्रबन्धन

मनुष्यों का समूह ‘समाज’ कहलाता है, जबकि पशुओं का समूह ‘समज’। दोनों में यह अन्तर है कि मनुष्यों का समूह व्यक्तिगत और सामूहिक विकास का एक साधन है, जबकि पशुओं के समूह में इस विकास की पहल का ही अभाव है। जैनधर्मदर्शन ने इसीलिए एकाकी और सामूहिक दोनों ही जीवन-पद्धतियों का समन्वयात्मक निर्देश किया है, किन्तु मानव की यह विडंबना है कि वह परस्पर सहकारिता और बन्धुत्व की भावना से जी नहीं पाता और परिणामस्वरूप समाज, परिवार आदि में क्लेश और कलह की अभिवृद्धि होती है। अतः समाज-प्रबन्धन आवश्यकता बन जाता है। इसका वर्णन प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है।

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अर्थ प्रबन्धन

‘अर्थ’ का आशय है-वस्तु। अतः उपभोग की वस्तुओं का ग्रहण एवं संचय करने वाले समग्र प्रयत्न या उद्यम ‘अर्थ-पुरुषार्थ' हैं। व्यक्ति की अनेकानेक भौतिक आवश्यकताएँ होती है, जैसे - पैसा, गृह, सम्पत्ति आदि। इनकी प्राप्ति के लिये किया गया पुरुषार्थ अर्थ-पुरुषार्थ कहलाता है। सामान्यतया इस अर्थ-पुरुषार्थ का साध्य काम-पुरुषार्थ होता है, क्योंकि व्यक्ति कामनाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिए अर्थ-पुरुषार्थ से जुड़ता है। अतः कहा जा सकता है कि ‘अर्थ’ साधन है और ‘भोग’ साध्य है। जैन आचार मीमांसा में ‘अर्थ’ और ‘भोग’ दोनों के सन्दर्भ में परिग्रह-परिमाण और भोगोपभोग परिमाण करने का सदुपदेश दिया गया है। अर्थ-प्रबन्धन वस्तुतः अर्थ-पुरुषार्थ के व्यवस्थितीकरण की प्रक्रिया है। इसकी विशेष चर्चा प्रस्तुत पुस्तक में की गई है।

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भोगोपभोग प्रबन्धन

संचित या एकत्रित वस्तुओं का उपयोग करने हेतु किया गया प्रयत्न या उद्यम ही भोग या काम का पुरुषार्थ कहलाता है। भ्रमित मानव वस्तुतः भौतिक सुख को ही यथार्थ सुख मान लेता है और इसकी प्राप्ति के लिए ऐन्द्रिक-विषयों का सेवन करता रहता है, यही भोग या काम का पुरुषार्थ है। जैन-जीवन-दृष्टि में भोग का पुरुषार्थ वस्तुतः दलदल के समान है, जिसमें भोगी पुरुष फँसता ही चला जाता है और अपने जीवन को नष्ट कर देता है।
भोग-प्रबन्धन भोगवृत्ति को शनैः-शनैः सीमित करने की एक प्रक्रिया है। इससे व्यक्ति की जीवनशैली संयमित होती जाती है। इसकी विस्तृत चर्चा प्रस्तुत पुस्तक में की गई है।

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धार्मिक व्यवहार प्रबन्धन

धर्म का अर्थ है-नैतिकता। अतः वह पुरुषार्थ, जिसके माध्यम से व्यक्ति अशुभाचार से निवृत्त होकर शुभाचार में प्रवृत्त होता है, धर्म पुरुषार्थ कहलाता है। यह पुरुषार्थ आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों ही जीवन रूपों में उपयोगी है। धर्म-पुरुषार्थ यदि व्यवहारीजन के लिए नैतिकता एवं सदाचारिता का माध्यम है, तो आत्मार्थीजन के लिए मुमुक्षुता और वैराग्य का उत्तम साधन है। वस्तुस्थिति यह है कि व्यक्ति धर्म के मर्म तक नहीं पहुँच पाता और इसीलिए धर्म-पुरुषार्थ करने का उचित परिणाम भी उसे प्राप्त नहीं हो पाता। इस प्रकार उसमें न तो सदाचारिता आ पाती है और न मुमुक्षुता या वैराग्य ही। अतः धार्मिक-व्यवहार-प्रबन्धन की नितान्त आवश्यकता है। इससे ही व्यक्ति धर्म की वैज्ञानिक गहनता को समझ सकता है। यह धर्म-प्रबन्धन वस्तुतः धार्मिक अंधविश्वासों और आडंबरों से रहित एक विशुद्ध विचारधारा है। इसकी विस्तृत चर्चा प्रस्तुत पुस्तक में की गयी है।

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आध्यात्मिक विकास प्रबन्धन

मोक्ष का अर्थ है-‘मुक्ति’। जहाँ इच्छाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का बन्धन है, वहाँ दुःख और तनाव अवश्यंभावी है और इसका तात्पर्य यह है कि मुक्त दशा में ही प्रसन्नता और आनन्द की प्राप्ति सम्भव है। जैन-जीवन-प्रबन्धन की प्रक्रिया का परम साध्य भी यही अवस्था है एवं तद्हेतु किया गया पुरुषार्थ मोक्ष-पुरुषार्थ कहलाता है। जैनदर्शन के अनुसार, समस्त पर-पदार्थों से भिन्न और निज-शुद्धात्मस्वरूप से अभिन्न आत्मिक अवस्था (परिणति) की प्राप्ति के लिए किया गया पुरुषार्थ मोक्ष-पुरुषार्थ है। जैसे-जैसे मोक्ष-पुरुषार्थ में प्रगति होती है, वैसे-वैसे आत्म-स्थिरता और तज्जन्य आत्मिक-आनन्द में अभिवृद्धि होती जाती है। इस पुरुषार्थ की चरम स्थिति मोक्ष है। इस कलिकाल में मोक्षमार्ग के साधन सुलभ नहीं है, जिससे अक्सर व्यक्ति पथभ्रष्ट भी हो जाया करता है। आध्यात्मिक-विकास-प्रबन्धन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से व्यक्ति धर्म, अर्थ और काम के पुरुषार्थ से शनैः-शनैः निवृत्त होता हुआ मोक्ष-प्राप्ति का सम्यक् प्रयत्न करता जाता है। इसकी विस्तृत चर्चा प्रस्तुत पुस्तक में की गई है।

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जीवन प्रबन्धन एक सारांश

जीवन प्रबन्धन वस्तुतः जैविक-वासनाओं पर विवेक का अंकुश लगाने का एक प्रयत्न है। यह हमें एक सम्यक् जीवन जीने की कला सिखाता है। यह अपने आप में एक विज्ञान भी है और कला भी। ‘विज्ञान’ सत्य को जानने का एक प्रयत्न है और ‘कला’ सत्य को जीने का एक प्रयत्न। जीवन-प्रबन्धन जीवन जीने की सम्यक् दिशा का बोध कराकर, उसे जीवन में जीने की एक कला के रूप में ही हमारे समक्ष लाता है। यह सिद्धान्त और व्यवहार दोनों ही है, इसीलिए प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध में जीवन-प्रबन्धन के सैद्धान्तिक और प्रायोगिक दोनों ही पक्षों की चर्चा की, लेकिन इस चर्चा में मुख्य आधार जैन-जीवन-दृष्टि रहा है।